गुरमा में 10 साल पुराना शासकीय कुआं धंसा, बुजुर्ग मलबे में दबे; निर्माण गुणवत्ता से लेकर निगरानी तक सवालों के घेरे में ,महज 10 साल में कैसे कमजोर हुआ शासकीय कुआं?

मुद्दा योजना की नहीं है चाहे मनरेगा योजना हो और या कोई शासकीय योजना हो, बल्कि बड़ा सवाल आम जनता की सुरक्षा की है
गुरमा में कुआं हादसा , मिली जानकारी अनुसार PHE विभाग से स्वीकृत होने की जानकारी; अब अभिलेख और तकनीकी जांच से खुलेगा सच
कोरबा/गुरमा। गुरमा गांव में करीब 10 साल पुराने शासकीय कुएं के अचानक धंसने से बुजुर्ग सोनसाय के मलबे में दबने की घटना ने सरकारी निर्माण कार्यों की गुणवत्ता और निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हादसे के बाद अब सवाल सिर्फ कुएं के धंसने का नहीं, बल्कि उसके निर्माण से लेकर वर्षों तक हुए रखरखाव और निरीक्षण की पूरी व्यवस्था का है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार उक्त कुआं मनरेगा योजना से निर्मित नहीं, बल्कि करीब 10 वर्ष पहले PHE विभाग से स्वीकृत शासकीय कूप बताया जा रहा है। हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि संबंधित विभाग के स्वीकृति आदेश, तकनीकी अभिलेख और निर्माण रिकॉर्ड से होना बाकी है।
*सबसे बड़ा सवाल—10 साल में ही क्यों कमजोर हुई संरचना?*
यदि कुआं करीब एक दशक पहले निर्धारित तकनीकी मापदंडों के अनुसार बनाया गया था, तो इतने कम समय में उसकी संरचना कमजोर होने के संभावित कारण क्या रहे? क्या निर्माण के दौरान सामग्री और गुणवत्ता की जांच हुई थी? क्या तकनीकी अधिकारियों ने निर्माण कार्य का निरीक्षण किया था? और क्या बाद के वर्षों में कुएं की सुरक्षा एवं संरचनात्मक स्थिति का परीक्षण किया गया?
*इन सवालों का जवाब अब विभागीय रिकॉर्ड और तकनीकी जांच से ही सामने आ सकता है।*
हादसे के बाद यह भी जांच का विषय है कि कुएं के निर्माण की गुणवत्ता जांच किस अधिकारी या तकनीकी अमले ने की थी। निर्माण पूरा होने के बाद उसका सत्यापन किस स्तर पर हुआ और क्या किसी रिकॉर्ड में कुएं की संरचनात्मक स्थिति का उल्लेख है?
यदि तकनीकी जांच में निर्माण अथवा रखरखाव संबंधी कोई कमी सामने आती है, तो उसकी जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया भी स्पष्ट होनी चाहिए।
*बनवार कुआं हादसे की कार्रवाई पर भी उठ रहे सवाल*
आखिरकार की गई कार्यवाही सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया
मामले के साथ बनवार कुआं हादसे के बाद विभाग द्वारा की गई कार्रवाई भी जांच के दायरे में आने की जरूरत है। क्या उस मामले में विभागीय जांच हुई? क्या किसी अधिकारी, कर्मचारी या निर्माण एजेंसी की जिम्मेदारी तय हुई? क्या जांच रिपोर्ट तैयार हुई और उसके आधार पर कोई कार्रवाई की गई
यदि जांच पूरी हो चुकी है तो उसके निष्कर्ष सार्वजनिक किए जाने चाहिए। आखिरकार की गई कार्यवाही सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया अगर जांच लंबित है तो उसकी स्थिति भी स्पष्ट की जानी चाहिए।
*मुद्दा योजना का नहीं, लोगों की सुरक्षा का और तकनीकी स्वीकृति ,गुणवत्ता, परीक्षण उपयोग सामग्री की है
गुरमा हादसे में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह नहीं है कि कुआं किस योजना से बना था। असली सवाल यह है कि एक शासकीय निर्माण की उम्र, गुणवत्ता और सुरक्षा की निगरानी के लिए जिम्मेदार व्यवस्था कितनी प्रभावी रही।
एक शासकीय कुआं यदि करीब 10 वर्ष में ही संरचनात्मक रूप से कमजोर होकर धंसता है, तो इसकी वास्तविक वजह सामने लाना जरूरी है। तकनीकी जांच से यह स्पष्ट होना चाहिए कि हादसा प्राकृतिक कारणों, मिट्टी की स्थिति, जलस्तर, संरचनात्मक कमजोरी, निर्माण गुणवत्ता या रखरखाव से जुड़ा था।
गुरमा की घटना को केवल एक हादसा मानकर छोड़ने के बजाय निर्माण रिकॉर्ड, तकनीकी स्वीकृति, गुणवत्ता परीक्षण, निरीक्षण रिपोर्ट और रखरखाव से जुड़े दस्तावेजों की जांच जरूरी है। आखिर शासकीय निर्माण में यदि कोई कमी रही, तो उसकी जिम्मेदारी किसकी है—इसका जवाब जांच के बाद सामने आना चाहिए।













